समान नागरिक संहिता: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का साहसिक संकल्प, मध्यप्रदेश से नए भारत की दिशा
— डॉ मनीष मेहता
इतिहास साक्षी है कि परिवर्तन का मार्ग कभी सरल नहीं होता। जो नेतृत्व यथास्थिति को चुनौती देता है, वही आने वाले समय का इतिहास लिखता है। मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का संकल्प केवल एक विधायी पहल नहीं, बल्कि संविधान की उस अधूरी आकांक्षा को साकार करने का प्रयास है, जिसे स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 में राष्ट्र के भविष्य का मार्गदर्शक सिद्धांत माना था।
डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट संकेत दिया है कि मध्यप्रदेश केवल विकास, निवेश और अधोसंरचना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक समता और सुशासन के क्षेत्र में भी नेतृत्व करने का प्रयास करेगा। उत्तराखंड के बाद यदि मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता लागू करने वाला प्रमुख राज्य बनता है, तो यह केवल प्रदेश की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारतीय संघीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।
समता का संवैधानिक मंत्र:
भारतीय संविधान की मूल आत्मा स्पष्ट है—सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान हैं। जब मौलिक अधिकार नागरिकों में भेद नहीं करते, तब नागरिक जीवन के मूल विषय—विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और पारिवारिक अधिकार—भी समान न्याय की कसौटी पर परखे जाने चाहिए।
समान नागरिक संहिता का अर्थ किसी धर्म का विरोध नहीं है; इसका उद्देश्य नागरिक अधिकारों की समानता है। संविधान ने नागरिक को पहले नागरिक माना है, बाद में उसकी धार्मिक पहचान को सम्मान दिया है। यही आधुनिक लोकतंत्र का आधार है।
निर्णायक नेतृत्व की पहचान:
बड़े निर्णय अक्सर बड़े साहस की मांग करते हैं।
डॉ. मोहन यादव का नेतृत्व इस अर्थ में उल्लेखनीय है कि उन्होंने ऐसे विषय को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है, जिस पर दशकों तक केवल बहस होती रही। अनेक सरकारों ने संवेदनशीलता के कारण इसे टालना उचित समझा, परंतु मध्यप्रदेश सरकार ने संकेत दिया है कि संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का समय आ गया है। लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान केवल लोकप्रिय निर्णयों से नहीं, बल्कि दूरगामी और कठिन निर्णयों से होती है।
नारी सम्मान और न्याय का प्रश्न:
यूसीसी का सबसे महत्वपूर्ण आयाम महिलाओं को समान कानूनी अधिकार उपलब्ध कराना है। यदि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में समान न्याय सुनिश्चित होता है, तो यह केवल कानूनी परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि सामाजिक समरसता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”—भारतीय परंपरा का यह आदर्श तभी सार्थक होगा, जब कानून भी महिलाओं के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करे।
मध्यप्रदेश से राष्ट्रीय संदेश:
मध्यप्रदेश लंबे समय से सुशासन, कृषि, निवेश और जनकल्याण की अनेक पहलों के लिए चर्चा में रहा है। अब यदि समान नागरिक संहिता का विधायी ढांचा भी परिपक्व विमर्श और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ता है, तो यह प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दे सकता है।
यह पहल इस संदेश को भी मजबूत करती है कि विकास केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संस्थाओं और समान अवसरों से भी मापा जाता है।
संवाद के साथ आगे बढ़ना होगा:
इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि ऐसे व्यापक सुधार सामाजिक संवाद, संवैधानिक मर्यादा और सभी हितधारकों की भागीदारी के साथ आगे बढ़ें। किसी भी बड़े कानून की स्थायी सफलता उसकी स्वीकार्यता, पारदर्शिता और न्यायपूर्ण क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने समान नागरिक संहिता के प्रश्न को केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे संविधान के अधूरे संकल्प और सामाजिक न्याय के व्यापक संदर्भ से जोड़ने का प्रयास किया है।
यदि यह पहल व्यापक संवाद, विधिक स्पष्टता और समान न्याय के सिद्धांतों पर आगे बढ़ती है, तो मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में केवल “हृदय प्रदेश” ही नहीं, बल्कि संवैधानिक सुधारों की प्रयोगशाला के रूप में भी जाना जा सकता है।
समय उन नेताओं को याद रखता है जो परिस्थितियों के अनुसार निर्णय नहीं लेते, बल्कि अपने निर्णयों से नई परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं। मध्यप्रदेश की यह पहल उसी संभावना की ओर बढ़ता हुआ एक महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होती है।

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