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नरोत्तम मिश्रा के बिना दतिया: भाजपा का साहसिक निर्णय या राजनीतिक जोखिम?

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डॉ मनीष मेहता

मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा का उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाना प्रदेश की राजनीति में दूरगामी संकेत देने वाला निर्णय माना जा रहा है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ. मिश्रा लगभग डेढ़ दशक तक दतिया की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा रहे हैं और शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान वे भाजपा के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में गिने जाते थे। भाजपा ने हाल ही में आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित किया, जबकि उपचुनाव की प्रक्रिया जारी है।

दतिया की राजनीतिक पृष्ठभूमि बताती है कि यह सीट लंबे समय तक व्यक्तित्व आधारित राजनीति का केंद्र रही। 2008, 2013 और 2018 में डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने लगातार विजय प्राप्त कर भाजपा का मजबूत आधार बनाया। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें पराजित कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए। बाद में न्यायिक कारणों से यह सीट रिक्त हुई और उपचुनाव की स्थिति बनी।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब पार्टी के पास छह बार विधायक रहे, संगठन और सरकार दोनों में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले अनुभवी नेता मौजूद थे, तब टिकट किसी नए चेहरे को क्यों दिया गया? इसका उत्तर भाजपा की बदलती राजनीतिक शैली में तलाशना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने कई राज्यों में यह संदेश देने का प्रयास किया है कि संगठन किसी एक नेता से बड़ा है। पार्टी स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन, युवा नेतृत्व और भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय कर रही है। दतिया में आशुतोष तिवारी को टिकट उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा केवल एक विधायक नहीं रहे। वे मध्यप्रदेश सरकार में गृह, विधि, संसदीय कार्य तथा जनसंपर्क जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व कर चुके हैं। विधानसभा में विपक्ष के आक्रमणों का जवाब देने से लेकर संकट की परिस्थितियों में सरकार का पक्ष रखने तक वे भाजपा के सबसे सक्षम वक्ताओं में शामिल रहे हैं। संगठन और सत्ता, दोनों में उनका राजनीतिक कद निर्विवाद रहा है।

यहीं से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका पर भी चर्चा प्रारंभ होती है। मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. यादव लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि मध्यप्रदेश भाजपा अब नई नेतृत्व संरचना के साथ आगे बढ़ेगी। उम्मीदवार चयन में उनकी राय और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय दिखाई देता है। हालांकि यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि केवल मुख्यमंत्री की इच्छा से टिकट बदला गया। भाजपा में उम्मीदवार चयन संसदीय बोर्ड और केंद्रीय नेतृत्व की सामूहिक प्रक्रिया से होता है। इसलिए इसे केवल व्यक्तिगत निर्णय बताना राजनीतिक सरलीकरण होगा। लेकिन इतना स्पष्ट अवश्य है कि मोहन यादव के नेतृत्व में पार्टी नई पीढ़ी के नेताओं को अवसर देने की नीति पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक दृष्टि से यह निर्णय अवसर और जोखिम दोनों लेकर आया है। अवसर इसलिए कि भाजपा यदि नया नेतृत्व स्थापित करने में सफल रहती है तो भविष्य में स्थानीय राजनीति किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहेगी। जोखिम इसलिए कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत जनाधार, संगठन पर पकड़ और कार्यकर्ताओं में प्रभाव आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि उनके समर्थकों में असंतोष बना रहता है तो उसका चुनावी प्रभाव भी पड़ सकता है। ऐसी नाराजगी की चर्चाएँ राजनीतिक हलकों में सामने आई हैं, हालांकि उनका वास्तविक चुनावी असर मतदान के बाद ही स्पष्ट होगा।

कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के भीतर असंतोष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है, जबकि भाजपा इसे संगठन सर्वोपरि की नीति बता रही है। ऐसे में दतिया का उपचुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि भाजपा के नए नेतृत्व मॉडल की पहली बड़ी परीक्षा भी बन गया है।

अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि टिकट किसे मिला। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भाजपा अपने सबसे अनुभवी नेताओं के अनुभव और नए नेतृत्व की ऊर्जा के बीच संतुलन बना पाएगी? यदि डॉ. नरोत्तम मिश्रा संगठन के निर्णय को स्वीकार करते हुए पूरी सक्रियता से आशुतोष तिवारी के पक्ष में मैदान में उतरते हैं, तो भाजपा यह संदेश देने में सफल होगी कि उसके लिए व्यक्ति नहीं, संगठन सर्वोपरि है। लेकिन यदि कार्यकर्ताओं के भीतर असंतोष बना रहता है तो दतिया का यह उपचुनाव भविष्य में मध्यप्रदेश भाजपा की आंतरिक राजनीति का अध्ययन करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केस स्टडी बन जाएगा।

दतिया की लड़ाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका परिणाम केवल एक विधायक तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि मध्यप्रदेश भाजपा का भविष्य अनुभवी नेतृत्व और नई पीढ़ी के बीच किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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