निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र कि अक्षुण आधारशिला, राजनीतिक दृष्टि तथा दृष्टिकोण
संजीव ठाकुर, चिंतक,स्तंभकार, रायपुर
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। करोडों मतदाताओं द्वारा यहां चुनाव से अपने विधायक,सांसद, मंत्री मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री तक का चुनाव किया जाता है। लाजमी है कि यहां विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है की सभी स्तर के चुनाव निष्पक्ष शांतिपूर्ण तथा वैधानिक तरीके से संपन्न किए जाएं जिससे जनता को सही तथा समुचित प्रतिनिधित्व मिल सके। चुनाव केवल प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विविधताओं से भरे समाज की आकांक्षाओं, असहमतियों और अधिकारों की अभिव्यक्ति भी हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को सौंपता है। वहीं, अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को आधार प्रदान करता है। इन संवैधानिक व्यवस्थाओं का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का मत समान महत्व रखे और सत्ता का निर्धारण जनता की स्वतंत्र इच्छा से हो। हालांकि, संवैधानिक प्रावधानों की वास्तविक सफलता उनके निष्पक्ष क्रियान्वयन से ही सिद्ध होती है।
“लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है” लिंकन का यह प्रसिद्ध कथन लोकतंत्र के सार को पूरी तरह स्पष्ट करता है। लेकिन लोकतंत्र की इस महान इमारत की नींव किस पर टिकी है? इसका उत्तर है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और सामूहिक इच्छाशक्ति का सबसे बड़ा उत्सव हैं। जब चुनाव निष्पक्ष होते हैं, तो हर नागरिक की आवाज़ गूंजती है, और जब इनमें धांधली होती है, तो लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है। हम निष्पक्ष चुनाव के विविध नजरियों, इसके दार्शनिक पहलुओं, महापुरुषों के विचारों और विदेशी राजनेताओं के नजरिया और दृष्टिकोण की बात करें तो यह मुद्दा काफी विस्तार से चर्चा करने लायक है।निष्पक्ष चुनाव का अर्थ केवल इतना नहीं है कि मतदान के दिन कोई हिंसा न हो। इसके दायरे में बहुत सी बातें आती हैं:
समान अवसर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को प्रचार करने, मीडिया तक पहुँचने और अपनी बात जनता तक पहुँचाने के समान अवसर मिलने चाहिए। मतदाता सूची से लेकर मतगणना तक की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। चुनाव कराने वाली संस्था किसी भी राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त होनी चाहिए।संविधान निर्माताओं ने भी इस बात को समझा था। भारतीय संविधान के शिल्पी डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था:
“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे साबित हुए, तो संविधान भी बुरा साबित होगा।” यह बात चुनावों पर भी पूरी तरह लागू होती है। चुनाव प्रक्रिया कितनी भी कानूनी रूप से मजबूत क्यों न हो, अगर उसे संचालित करने वाले या उसमें भाग लेने वाले लोग नैतिक रूप से भ्रष्ट हो जाएं, तो निष्पक्षता खतरे में पड़ जाती है। दुनियाभर के महान विचारकों और नेताओं ने चुनावों की पवित्रता और निष्पक्षता पर जोर दिया है।
महात्मा गांधी नैतिकता और राजनीति को अलग-थलग नहीं मानते थे। उनका मानना था कि साधन और साध्य दोनों पवित्र होने चाहिए। यदि चुनाव जीतने के साधन भ्रष्ट जैसे धनबल और बाहुबल का प्रयोग हैं, तो मिलने वाली जीत का कोई नैतिक मूल्य नहीं होगा। गांधीजी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र तभी आ सकता है जब हर नागरिक बिना किसी भय या प्रलोभन के अपने विवेक का इस्तेमाल करे। रंगभेद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाले और दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा था: “मतदान पत्र बंदूक की गोली से अधिक शक्तिशाली होता है।” मंडेला का यह कथन इस बात को रेखांकित करता है कि निष्पक्ष चुनाव जनता को बिना हिंसा के समाज बदलने की सबसे बड़ी ताकत देते हैं।
“मतदान पत्र बंदूक की गोली से अधिक शक्तिशाली होता है।निष्पक्ष चुनाव का मुद्दा केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक लोकतंत्र की सेहत का पैमाना है।ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने लोकतंत्र के बारे में कहा था: “लोकतंत्र सरकार का सबसे खराब रूप है, सिवाय उन सभी अन्य रूपों को छोड़कर जिन्हें समय-समय पर आजमाया गया है।” चर्चिल का यह कथन लोकतंत्र की कमियों को स्वीकार करते हुए भी इसके चुनाव-आधारित स्वरूप की अनिवार्यता को बताता है। ब्रिटेन में चुनावी वित्तपोषण और निष्पक्षता को लेकर कड़े नियम हैं। वहां के राजनेता मानते हैं कि चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास ही सरकार की वैधता की एकमात्र गारंटी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गेटीसबर्ग संबोधन में लोकतंत्र को जो परिभाषा दी, वह आज भी प्रासंगिक है। अमेरिकी राजनीति में निष्पक्ष चुनाव और मताधिकार हमेशा से बहस के केंद्र में रहे हैं। अमेरिकी राजनेताओं और मानवाधिकार विदों का अक्सर यह मत रहता है कि “मताधिकार हर नागरिक का वह पवित्र अधिकार है जो उसकी नागरिकता को जीवंत बनाता है।” अमेरिकी इतिहास में नागरिक अधिकार आंदोलन इसी बात की गवाही देता है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए हर वर्ग को बिना भेदभाव के वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ जैसे वैश्विक संस्थान भी यह मानते हैं कि निष्पक्ष चुनाव मानवाधिकारों का एक अनिवार्य हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 21 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जनता की इच्छा ही सरकार के प्राधिकार का आधार होगी, और यह इच्छा समय-समय पर होने वाले वास्तविक और निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से व्यक्त की जानी चाहिए। आज के डिजिटल युग में निष्पक्ष चुनाव के सामने कई नई और जटिल चुनौतियाँ खड़ी हो गई है।चुनावों में अत्यधिक धन का खर्च होना निष्पक्षता को प्रभावित करता है। इससे आम आदमी या गरीब पृष्ठभूमि का व्यक्ति चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं पाता। एल्गोरिदम और दुष्प्रचार के जरिए मतदाताओं के मानस को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। विदेशी ताकतें या आंतरिक दल भी प्रोपेगैंडा फैलाकर चुनाव के परिणामों को मोड़ने का प्रयास करते हैं।
कई देशों में चुनावी निकायों पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाने की खबरें आती हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगते हैं। विभिन्न दार्शनिकों, महापुरुषों और वैश्विक नेताओं के विचारों का विचार यही है कि निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ हैं। यदि रीढ़ टूट जाएगी, तो लोकतांत्रिक ढांचा धराशायी हो जाएगा।
चुनाव केवल सरकारों को चुनने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह हमारे भविष्य का ब्लूप्रिंट तय करते हैं। जैसा कि अमेरिकी राजनीतिज्ञ बराक ओबामा ने अपने एक भाषण में कहा था
लोकतंत्र कोई तमाशा देखने की चीज नहीं है, यह भागीदारी की मांग करता है । एक निष्पक्ष चुनाव तभी संभव है जब शासन प्रणाली पारदर्शी हो, निर्वाचन आयोग स्वतंत्र हो और सबसे बढ़कर—मतदाता जागरूक और निडर हो। जब मतदाता जाति, धर्म, धन और प्रलोभन से ऊपर उठकर केवल योग्यता और नीतियों के आधार पर वोट देना शुरू कर देगा, तभी धरती पर सच्चे अर्थों में निष्पक्ष चुनाव और वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना होगी।





