Saturday, September 12, 2026
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स्त्री जागरण के बिना राष्ट्र की प्रगति और विकास अधूरा ।

The progress and development of the nation is incomplete without women’s awakening.

स्त्री जागरण के बिना राष्ट्र की प्रगति और विकास अधूरा ।

संजीव ठाकुर, स्तंभकार , चिंतक , लेखक – रायपुर (छत्तीसगढ़)

सुसंस्कृत और शिक्षित नारियाँ राष्ट्र की असली कर्णधार होती हैं। उनके योगदान के बिना किसी भी समाज या देश की प्रगति अधूरी है। केवल भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व में स्त्रियाँ अपने नैसर्गिक सम्मान की अधिकारी हैं। किसी भी राष्ट्र का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब उसमें नारी को उचित स्थान और समान अधिकार मिलें।
भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव पूजनीय माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”। नवरात्रि की नौ देवियाँ शक्ति के वे प्रतीक हैं जिन्होंने आतताइयों और राक्षसों से देवताओं व मानवता की रक्षा की।परंतु पुरुष प्रधान समाज ने नारी को लंबे समय तक निर्णय और अधिकार से वंचित रखा। आदिम काल से लेकर आधुनिक युग तक उसे स्वतंत्र व्यक्ति नहीं माना गया। धर्मशास्त्रों में भी नारी को पिता, पति या पुत्र के संरक्षण में ही जीवन बिताने की संस्तुति की गई। पश्चिमी लोकतांत्रिक समाज भी इससे अछूता नहीं था। इंग्लैंड में महिलाओं को 1918 तक और अमेरिका में 1920 तक मतदान का अधिकार नहीं मिला।
भारत इस दृष्टि से अग्रणी रहा। 1920 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोरनेलिया सोराबजी को “व्यक्ति” मानते हुए वकालत का अधिकार दिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला को व्यक्ति का दर्जा 1929 के आसपास ही मिला। यह नारी सम्मान के इतिहास में भारत की बड़ी उपलब्धि थी।
भारतीय समाज ने नारी को अक्सर अबला कहा, लेकिन विद्वानों और विचारकों ने इस धारणा को चुनौती दी। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने नारी को नर की सहचरी और उससे भी अधिक सामर्थ्यवान बताया। लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा—“स्त्रियाँ जन्म से अबला नहीं होतीं, उन्हें पुरुष समाज अबला बनाए रखता है।” वास्तव में शिशु बालिका की जीवन शक्ति शिशु बालक से अधिक प्रबल होती है, किंतु सामाजिक रूढ़ियाँ उसे बाँध देती हैं।
नारीवाद, मानवाधिकार और पर्यावरण आंदोलनों ने महिला को बराबरी दिलाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत अमेरिका से हुई और रूस की महिलाओं ने 1917 में रोटी, कपड़ा और समानता के लिए हड़ताल कर इसे वैश्विक चेतना का प्रतीक बनाया।
?आज भारत की महिलाएँ स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, प्रशासन, सेना, अंतरिक्ष और राजनीति हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं। इंदिरा गांधी, गोल्डा मायर, मार्गरेट थैचर और श्रीमावो भंडारनायके जैसी महिलाओं ने इतिहास रचा। वर्तमान में कमला हैरिस, निर्मला सीतारमण, द्रौपदी मुर्मू, स्मृति ईरानी, किरण बेदी और कल्पना चावला नारी सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल हैं।
फिर भी तस्वीर का दूसरा पहलू चिंता पैदा करता है। भारत की 65% महिलाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं, जहाँ मात्र 45% ही शिक्षित हैं। शहरी क्षेत्रों में स्थिति बेहतर है, परंतु कुल जनसंख्या की तुलना में महिला भागीदारी अत्यंत कम है। बलात्कार, शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ आए दिन सुर्खियाँ बनती हैं। आँकड़े बताते हैं कि प्रति मिनट सैकड़ों महिलाएँ प्रताड़ना झेलती हैं।नारी सशक्तिकरण केवल नारेबाज़ी से संभव नहीं होगा। शिक्षित और जागरूक महिलाओं को शासन-प्रशासन में सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि नारी अबला नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवनधारा और शक्ति का स्तंभ है। जिस समाज ने स्त्री को समानता और सम्मान दिया, वही समाज वास्तविक समृद्धि की राह पर बढ़ा।