InternationalDelhiNational

मेलबर्न मिशन: क्या मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा भारत को इंडो-पैसिफिक की निर्णायक शक्ति बनाएगी?

Spread the love

भारत की विदेश नीति का नया अध्याय या वैश्विक शक्ति संतुलन की नई रणनीति?

(डॉ मनीष मेहता)
प्रधान संपादक | दैनिक जर्नलिस्ट डेस्क

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 8 से 10 जुलाई तक ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न का तीन दिवसीय दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब विश्व व्यवस्था अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर चीन का बढ़ता सामरिक विस्तार, दूसरी ओर रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अस्थिरता, पश्चिम एशिया में तनाव, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य प्रतिस्पर्धा और आर्थिक सुरक्षा की नई अवधारणाएँ—इन सबने भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को पहले से अधिक निकट ला दिया है।


प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ द्विपक्षीय वार्ता, गवर्नर-जनरल सैम मोस्टिन से मुलाकात, इंडिया–ऑस्ट्रेलिया CEO फोरम को संबोधन तथा प्रवासी भारतीयों से संवाद केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं हैं। ये संकेत हैं कि भारत अब विदेश नीति को केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि उसे आर्थिक शक्ति, तकनीकी नेतृत्व, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक साझेदारी से जोड़ रहा है।


इतिहास गवाह है—रिश्तों ने लंबी यात्रा तय की है
भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध हमेशा इतने प्रगाढ़ नहीं थे। 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे। लंबे समय तक दोनों देशों के संबंध सीमित व्यापार और राष्ट्रमंडल की औपचारिकताओं तक ही सीमित रहे।
परिवर्तन 2014 के बाद स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। लगभग 28 वर्षों के अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक यात्रा की। उसके बाद रक्षा, शिक्षा, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक सहयोग लगातार बढ़ा। 2020 में दोनों देशों ने Comprehensive Strategic Partnership स्थापित की। 2022 में Economic Cooperation and Trade Agreement (ECTA) लागू हुआ। इसके बाद द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। भारत का ऑस्ट्रेलिया से आयात बढ़ा, वहीं भारतीय दवाइयों, वस्त्र, इंजीनियरिंग उत्पादों और आईटी सेवाओं के लिए नए अवसर खुले।


क्यों महत्वपूर्ण है यह यात्रा?
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब चीन की आक्रामक विदेश नीति ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों की रणनीतियाँ बदल दी हैं। ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से चीन के आर्थिक दबाव का सामना कर चुका है, जबकि भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की सैन्य चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे में भारत और ऑस्ट्रेलिया की सामरिक साझेदारी केवल द्विपक्षीय हित नहीं, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन का विषय बन चुकी है। QUAD—भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया—आज केवल एक सामरिक मंच नहीं, बल्कि मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था की अवधारणा का प्रतिनिधित्व करता है। मेलबर्न की बैठकें इस सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।


व्यापार ही नहीं, भविष्य की तकनीक का भी गठबंधन
आज विश्व की नई प्रतिस्पर्धा तेल पर नहीं, बल्कि लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ खनिजों पर केंद्रित हो चुकी है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी उद्योग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विनिर्माण के लिए इन संसाधनों की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है। ऑस्ट्रेलिया इन महत्वपूर्ण खनिजों का प्रमुख उत्पादक है, जबकि भारत विश्व का सबसे बड़ा उभरता हुआ विनिर्माण और उपभोक्ता बाजार बन रहा है। यदि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते होते हैं तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और “मेक इन इंडिया” अभियान को नई गति मिल सकती है।


शिक्षा, अनुसंधान और प्रतिभा की नई साझेदारी
ऑस्ट्रेलिया भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा देशों में शामिल है। हर वर्ष हजारों भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए वहां जाते हैं। यदि इस यात्रा में विश्वविद्यालयों, संयुक्त अनुसंधान, स्टार्टअप, कौशल विकास और नवाचार पर नए समझौते होते हैं तो दोनों देशों के संबंध आने वाले दशकों तक मजबूत बने रहेंगे। भारत के युवाओं को वैश्विक अवसर मिलेंगे और ऑस्ट्रेलिया को कुशल मानव संसाधन।


प्रवासी भारतीय: भारत की सॉफ्ट पावर
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं की सबसे बड़ी विशेषता रही है—प्रवासी भारतीयों से सीधा संवाद। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में भारतीय समुदाय भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक छवि को मजबूत कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल का समुदाय तेजी से बढ़ा है। शिक्षा, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार और सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। यही समुदाय भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच विश्वास का सबसे मजबूत सेतु बन सकता है।


भारत की विदेश नीति—अब केवल आदर्शवाद नहीं, यथार्थवाद
स्वतंत्रता के बाद भारत लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता की नीति पर चला। शीत युद्ध की परिस्थितियों में यह नीति प्रासंगिक थी, किंतु बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत ने अपनी विदेश नीति को अधिक व्यावहारिक बनाया है। पिछले दशक में भारत ने “Neighbourhood First”, “Act East”, “SAGAR”, “Indo-Pacific Oceans Initiative” और “Global South” जैसे बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाए। यही कारण है कि भारत आज अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदार है, रूस के साथ रक्षा संबंध बनाए हुए है, फ्रांस के साथ हिंद महासागर में सहयोग करता है, खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा संबंध मजबूत कर रहा है और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक साझेदारी को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहा है।


लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार अभी भी वास्तविक क्षमता से काफी कम है। व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (CECA) अब भी लंबित है। कृषि, डेयरी, बाजार पहुंच, निवेश और पेशेवरों की आवाजाही जैसे विषयों पर कई मतभेद बने हुए हैं।साथ ही दोनों देशों के चीन के साथ आर्थिक संबंधों की प्रकृति अलग है। इसलिए रणनीतिक सहयोग को व्यवहारिक संतुलन के साथ आगे बढ़ाना होगा।


इस यात्रा से जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की संभावना है, उनमें शामिल हैं—

  1. व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) को गति।
  2. क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी आपूर्ति शृंखला पर दीर्घकालिक साझेदारी।
  3. रक्षा, समुद्री सुरक्षा और साइबर सहयोग का विस्तार।
  4. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और डिजिटल नवाचार में संयुक्त पहल।
  5. शिक्षा, कौशल विकास और विश्वविद्यालय सहयोग के नए समझौते।
  6. निवेश, स्टार्टअप और हरित ऊर्जा परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी।
    • निष्कर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेलबर्न यात्रा का वास्तविक महत्व केवल हस्ताक्षरित समझौतों में नहीं, बल्कि उस रणनीतिक संदेश में निहित है जो भारत विश्व को देना चाहता है—भारत अब केवल वैश्विक घटनाओं का दर्शक नहीं, बल्कि उनका सक्रिय निर्माता बनना चाहता है। यदि यह यात्रा व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और शिक्षा में ठोस उपलब्धियाँ देती है, तो आने वाले वर्षों में भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली लोकतांत्रिक साझेदारियों में गिने जाएंगे। भारत की विदेश नीति अब प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पहल करने वाली नीति बन चुकी है। मेलबर्न इस परिवर्तन का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। आने वाला समय बताएगा कि यह यात्रा केवल राजनयिक सफलता थी या 21वीं सदी की एशियाई भू-राजनीति का निर्णायक मोड़ |

मेलबर्न मिशन: क्या मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा भारत को इंडो-पैसिफिक की निर्णायक शक्ति बनाएगी?
मेलबर्न मिशन: क्या मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा भारत को इंडो-पैसिफिक की निर्णायक शक्ति बनाएगी?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *