Saturday, September 12, 2026
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ग्लोबल हिंसा युद्ध बड़े शासकों की सनक का परिणाम, विस्तारवाद की चाहत में लगे विराम

Global violence and war are the result of the madness of big rulers, a stop to the desire for expansionism

ग्लोबल हिंसा-युद्ध बड़े शासकों की सनक का परिणाम, विस्तारवाद की चाहत में लगे विराम

संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़

किसी भी विचार या मुद्दों से असहमती के प्रतिफल में हिंसा या क्रूरता नहीं की जा सकती। विचारों से असहमति और हिंसा के विरोध में प्रतिहिंसा समस्या का हल नही हो सकता है। सबसे ताजा क्रूर और हिंसात्मक परिणाम फिलिस्तीन-इजरायल युद्ध के रूप में सामने आया है। जिसमें 20000 लोगों की जान चली गई और
50000 लोगों से ज्यादा घायल मानविय शरीर कराह रहे हैं। इसराइल ने फिलीस्तीन, हमास,लेबनान को तबाह कर दिया है आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह को नेस्तनाबूत करने की बात तो एक बार समझ में आती है पर लेबनान के 50 लाख लोगों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देना तानाशाही का एक भयानक रूप ही दिखाई देता है। इसके बाद भी उसकी हिंसा की प्यास नहीं बुझी है और अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध में अमेरिका ने युद्ध के सबसे बड़े हथियार रूपी हवाई जहाज से ईरान ईरान के संग्रहण ठिकानों में हवाई हमला कर युद्ध का रौद्र रूप दिखाया इजरायल ईरान आपस में बैलिस्टिक मिसाइल से हमला कर एक दूसरे के महत्वपूर्ण ठिकानों को तबाह कर दिया हैl दूसरी तरफ रूस यूक्रेन युद्ध को 2 साल से ज्यादा समय हो चुका है इस युद्ध ने दोनों देशों के लाखों लोगों को बेघर कर दिया गया है और हजारों लोगों की जान चली गई है। दोनों देशों के अरबों रुपए इस युद्ध में खर्च हो चुके हैं यदि इस धनराशी का विकास के लिए मानव शांति के लिए उपयोग किया गया होता तो आज दोनों देशों में शांती के साथ विकास भी होताl नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने अमेरिका को इजराइल का साथ न देने की स्पष्ट चेतावनी देकर कहा है कि यदि वह इजराइल पिलिस्तानी लेबनान ईरान युद्ध में बीच में आया तो उत्तर कोरिया अमेरिका पर परमाणु हमला कर देगा। जब तक विश्व में व्लादिमीर पुतिन, सी जिन पिंग,नेतन्याहू और किम जोंग-उन जैसे खून के प्यासे तानाशाह रहेंगे विश्व में शांति स्थापना की कल्पना करना नामुमकिन ही होगा। आज वैश्विक शांति में खलबली मची हुई है। धरती विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है। ऐसे में भारत जैसे शांतिप्रिय, निर्गुण देश को भी सावधान और सतर्क हो जाना चाहिए। उसके परंपरागत शत्रु चीन और पाकिस्तान भी हमेशा भारत की सीमा में घात लगाए बैठे रहते हैं और आक्रमण का खतरा भी सदैव बना रहता है। आइये भारत का एक रचनात्मक विश्लेषण करते हैं-:
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक,प्रजातांत्रिक स्वतंत्र राष्ट्र है।यहां वैचारिक चिंतन, प्रभुद्धता लोकतंत्र के प्रमुख अवयव होते हैं, राष्ट्र के किसी भी नीति में सहमत और असहमत होना एक सामान्य प्रक्रिया-प्रतिक्रिया हो सकती है, और आम जनमानस का किसी मुद्दे पर आप सहमत होना भी एक सामान्य बात हो सकती है पर किन्ही भी परिस्थितियों में असहमति हिंसा के रूप में कतई बर्दाश्त के योग्य नहीं होनी चाहिए, विरोध का स्वरूप राष्ट्रीय संपत्ति की बर्बादी तो किसी भी काल और खंड में स्वीकार्य नहीं है। यह राष्ट्र के लिए घातक और विकास की अवधारणा को अवरुद्ध करने वाला आत्मघाती कदम है।आंदोलन का स्वरूप सदैव शांति पूर्वक हो तो राष्ट्र तथा आमजन के हित में ही होगा। आंदोलनकारियों को शायद यह गुमान नहीं है कि राष्ट्रीय सरकारी संपत्ति आपके द्वारा दिए गए टैक्स के रूप में रुपयों से ही निर्मित होती है, इसे नष्ट करके आप स्वयं अपनी संपत्ति का नुकसान ही कर रहे हैं। आजादी के बाद से भारत के समक्ष कई सामाजिक आर्थिक समस्याएं आई है। अक्सर सामाजिक क्षेत्र में समस्याओं ने अर्थव्यवस्था की उत्तरोत्तर प्रगति पर अवरोध खड़े किए हैंl देश की सामाजिक विषमताओं ने समाज में कई समस्याओं को जन्म दिया है एवं आर्थिक प्रगति पर विभिन्न सोपानों में लगाम लगाई है। भारतीय समाज में विषमता एवं विविधता भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनकर सामने खड़ी है। स्वतंत्रता के पूर्व तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय समाज में विषमताएं भारत के लिए चुनौती बनकर वर्तमान में कई बाधाएं उत्पन्न कर रही हैं। आज जातिगत संघर्ष बढ़ गए हैं,जातिगत संघर्षों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने बहुत क्लिष्ट बना दिया है। राजनीति सदैव महत्वाकांक्षा के बल पर जातिगत समीकरण को नए-नए रूप तथा आयाम देती आई है और सदैव समाज में वर्ग विभेद आर्थिक विभेद कर के अपना उल्लू सीधा करना मुख्य ध्येय बन चुका है। उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग सदैव सत्ता के संघर्ष के लिए न सिर्फ एक दूसरे का परस्पर विरोध करते है बल्कि शासन प्रशासन के विरोध में भी सदैव खड़े पाए गए हैं। सत्ता पाने की लालसा में जातीय संघर्ष, नक्सलवाद तेजी से समाज में पनपता जा रहा है। भारतीय परिपेक्ष में आज सिर्फ जाती ही नहीं धार्मिक महत्वाकांक्षा देश के समाज के समक्ष चुनौती बन गया है। भारत में हिंदू मुस्लिम जाति संघर्ष ऐतिहासिक तौर पर अपनी जड़ें जमां चुका है, वर्तमान में मंदिर और मस्जिद के झगड़े देश में अशांत माहौल पैदा करने का एक बड़ा सबक बन चुके है।और यही वर्ग विभेद संघर्ष भारतीय आर्थिक विकास के बीच एक बड़ा अवरोध बनकर खड़ा है। पश्चिमी विद्वान भी कहते हैं कि भारत के राष्ट्र के रूप में विकसित होने में जाति एवं धर्म ही सबसे बड़ी बाधाएं हैं जिन्हें दूर करना सर्वाधिक कठिन कार्य है क्योंकि इसकी जड़ें भारत के स्वतंत्रता के पूर्व से देश में गहराई लिए हुए हैं। जातीय वर्ग संघर्ष और भाषाई विवाद ऐसा मुद्दा रहा है जिससे लगभग एक शताब्दी तक भारत आक्रांत रहा है। आजादी के बाद से ही भाषा विवाद को लेकर कई आंदोलन हुए खासकर दक्षिण भारत राज्यों द्वारा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने एवं देश पर हिंदी थोपे जाने के विरोध में विरोध प्रदर्शनों को प्रोत्साहित किया गया। आज भी विभिन्न राज्यों में भाषाई विवाद एक ज्वलंत एवं संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है, चाहे वह बंगाल हो, तमिलनाडु हो, आंध्र प्रदेश हो, उड़ीसा और महाराष्ट्र में भी भाषाई विवाद अलग-अलग स्तर पर सतह पर पाए गए हैं। समान सिविल संहिता को लेकर बहुसंख्यक संविधान में आक्रोश है दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय इसलिए डरा हुआ है कि कहीं उसकी अपनी अस्मिता एवं पहचान अस्तित्व हीन ना हो जाए। स्वतंत्रता के बाद से यह विकास की मूल धारणा थी कि पंचवर्षीय योजनाओं में वर्ग विहीन समाज में लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष तरीके से समाज का आर्थिक विकास तथा रोजगार के साधन उपलब्ध हो सकेंगे। पर स्वतंत्रता के 77 साल के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वर्ग विभेद भाषाई विवाद ने अभी भी आर्थिक विकास में कई बाधाएं उत्पन्न की है। समाज की मुख्यधारा में राष्ट्रवाद को एक प्रमुख अस्त्र बनाकर देश की प्रगति में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। भारत में आजादी के 75 वर्ष बाद भी ब्रिटिश हुकूमत की तरह गरीबी, भूखमरी ,बेरोजगारी ,नक्सलवाद, आतंकवाद, सांप्रदायिकता,भाषावाद एवं क्षेत्रीय विघटनकारी प्रवृत्तियां सर उठाये घूम रही हैं, हम इन पर अभी तक प्रभावी नियंत्रण नहीं लगा पाए हैं। हमें इन सब विसंगतियों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नागरिकता एवं भारत राष्ट्र की विकास की अवधारणा को राष्ट्रवाद से जोड़कर आर्थिक विकास को एक नया आयाम देना होगा,तब जाकर भा मजबूत एवं आत्मनिर्भर बन सकेगा। किसी बात का विरोध हिंसा के बिगड़े स्वरूप की तरफ शासकीय संपत्ति को नष्ट करना देश हित में नहीं।