नशा मुक्ति अभियान को मिली नई मजबूती
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय नशा मांग में कमी, पुनर्वास तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्रों में समय पर वित्तीय सहायता, अधिक पारदर्शिता और सेवाओं की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं के कार्यान्वयन को लगातार मजबूत कर रहा है। मंत्रालय ने धनराशि जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाने, नशामुक्ति अवसंरचना का विस्तार करने तथा देशभर में पुनर्वास सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
यह जानकारी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री बी. एल. वर्मा ने सांसद श्रीमती प्रतिमा मंडल द्वारा पूछे गए अनेक प्रश्नों के लिखित उत्तर में दी। मंत्री ने सदन को बताया कि विभाग ने विभिन्न केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत प्रस्तावों के समयबद्ध निस्तारण तथा अनुदान जारी करने के लिए एक सुदृढ़ निगरानी तंत्र स्थापित किया है। साथ ही, संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू की गई है, जिससे राष्ट्रीय नशा मांग न्यूनीकरण कार्ययोजना (NAPDDR) तथा अटल वयो अभ्युदय योजना (AVYAY) जैसी योजनाओं को लागू करने वाले साझेदार गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को अनुदान जारी करने की प्रक्रिया सरल हुई है। इसके तहत दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकताओं को कम किया गया है तथा प्रशासनिक दक्षता में सुधार किया गया है।
मादक पदार्थों के दुरुपयोग से निपटने के लिए सरकार के प्रयासों का उल्लेख करते हुए श्री वर्मा ने कहा कि मंत्रालय राष्ट्रीय नशा मांग न्यूनीकरण कार्ययोजना (NAPDDR) के अंतर्गत एक व्यापक एवं साक्ष्य-आधारित रणनीति लागू कर रहा है। यह रणनीति अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के राष्ट्रीय ड्रग निर्भरता उपचार केंद्र (NDDTC) द्वारा किए गए भारत में मादक पदार्थों के उपयोग की व्यापकता एवं स्वरूप पर प्रथम राष्ट्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर आधारित है।
सर्वेक्षण के अनुसार, 18 से 75 वर्ष आयु वर्ग के वयस्कों में शराब सबसे अधिक सेवन किया जाने वाला मादक पदार्थ है, जिसके लगभग 15.10 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। इसके बाद लगभग 2.90 करोड़ लोग कैनाबिस (गांजा), 1.90 करोड़ लोग ओपिओइड, 1.10 करोड़ लोग शामक तथा 60 लाख लोग इनहेलेंट्स का उपयोग करते हैं। वहीं 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों एवं किशोरों में लगभग 40 लाख ओपिओइड उपयोगकर्ता, 30 लाख शराब उपयोगकर्ता, 30 लाख इनहेलेंट उपयोगकर्ता तथा 20 लाख कैनाबिस उपयोगकर्ता होने का अनुमान है। यह स्थिति निरंतर जागरूकता, रोकथाम और उपचार संबंधी पहलों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
