Wednesday, September 16, 2026
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विधानसभा चुनावों में विपक्ष की करारी हार के बाद उसके तेवर ढीले पड़े

After the crushing defeat of the opposition in the assembly elections, its stance softened

विधानसभा चुनावों में विपक्ष की करारी हार के बाद उसके तेवर ढीले पड़े

डॉ हरिकृष्ण बड़ोदिया (लेखक सेवा निवृत प्राध्यापक समाजशास्त्र है)

2024 के लोकसभा चुनाव में देश के विपक्ष को जो सफलता मिली थी उसने उसे इतना उत्साहित किया था कि न तो वह चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर रहा था और न ही वह ईवीएम के खिलाफ बहुत ज्यादा आक्रोशित दिखाई दे रहा था। कारण इतना भर था कि कांग्रेस अपनी 2019 की 52 सीटों से बढ़कर 99 पर पहुंच गई थी और भाजपा 2019 की 303 सीटों से घटकर 240 पर आ गई थी।
इन परिणामों के बाद के शुरुआती महीनों में विपक्ष के प्रचार से ऐसा लग रहा था कि मोदी काल लगभग उतार की तरफ जा रहा है। मोदी का करिश्माई नेतृत्व जो 2019 में भाजपा को विशिष्ट सफलता अर्जित कराने में कामयाब हुआ वह 2024 में उतना प्रभावी नहीं लगा जितना 2019 में था बल्कि ऐसा लग रहा था कि आगे आने वाले चुनावों में मोदी की छवि और नेतृत्व कमजोर होता दिखाई पड़ेगा लेकिन यह एक गलत निष्कर्ष था। यह सही है कि यदि पवन कल्याण के प्रयासों से आंध्र प्रदेश में भाजपा का टीडीपी से गठजोड़ ना होता और जदयू के नितीश बाबू इंडी गठबंधन से नाराज होकर एनडीए के साथ ना आते तो मोदी तीसरी बार सत्ता से बेदखल होते ही दिखाई देते। मोदी के प्रधानमंत्री बनने को आज लगभग 10 महीने हो गए हैं। इन 10 महीनों में एक बड़ा बदलाव यह दिखाई दिया कि विपक्ष का संविधान खतरे में है, लोकतंत्र खतरे में है, मोदी आए तो आरक्षण खत्म हो जाएगा जैसे उन झूठे विमर्श को जिनके बल पर वह थोड़ा सम्मानजनक परिणाम हासिल कर पाया था को छोड़ना विपक्ष की मजबूरी बन गया। अब वह नए मुद्दों की तलाश में दिखाई दे रहा है। संसद के पिछले सत्रों में जहां विपक्ष जाति आधारित जनगणना कराने का गला फाड़ कर राग अलाप रहा था वहीं आज की स्थिति में वह मतदाता सूची पर संसद में बहस की मांग पर केन्द्रित हो रहा है। विधानसभा चुनावों में विपक्ष की करारी हार के बाद उसके तेवर ढीले पड़े हैं। पहले हरियाणा फिर महाराष्ट्र और अभी-अभी दिल्ली के चुनाव में मोदी के नाम पर भाजपा तथा एनडीए की एक तरफा जीत ने विपक्ष को चारों खाने चित करने का काम किया है। निश्चित ही मोदी तीन विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद ज्यादा विश्वसनीय और प्रासंगिक बनकर उभरे हैं। ऐसे में विपक्ष को अपनी रणनीति में बदलाव करना एक मजबूरी ही माना जाएगा। पिछले सत्रों में जहां संसद में विपक्ष जाति आधारित जनगणना को मुद्दा बना रहा था वहीं वह वर्तमान सत्र में मतदाता सूची पर बहस की मांग करता दिखाई दे रहा है। हालांकि वह जाति आधारित जनगणना के मुद्दे को छोड़ देगा ऐसा लगता नहीं। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा में हुई अपनी हार को विपक्ष पचा नहीं पा रहा है यही कारण है कि वह इन चुनावों में सरकार पर बड़े स्तर पर मतदाता सूची में हेरा फेरी का आरोप लगा रहा है जबकि चुनाव आयोग ने इसे सिरे से नकार दिया है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा कि सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के विचार को विफल करने के लिए मतदाता सूची में हेरा फेरी करने का जानबूझकर काम किया गया है।
असल में विपक्ष इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा और अगले वर्ष में आने वाले पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल के चुनाव के पहले ऐसा विमर्श खड़ा करने की जुगत में है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में सत्ताधारी दल मतदाता सूचियां में हेरा फेरी कर जीता है। वह यह भी प्रचारित करना चाहता है कि यदि मतदाता सूचियों में हेरा फेरी ना होती तो इन दोनों राज्यों में परिणाम लोकसभा चुनाव के परिणामों की तरह ही विपक्ष के पक्ष में जाते और कांग्रेस या इंडी गठबंधन की सरकारें बनती। संसद में इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ तृणमूल कांग्रेस भी खड़ी दिखाई दे रही है। जो ममता बनर्जी पिछले 15 सालों से बंगाल की सत्ता पर काबिज हैं तथा कांग्रेस के धुर विरोध के लिए जानी जाती हैं वे अगले साल पश्चिम बंगाल में अपनी जीत को लेकर शंकाग्रस्त दिखाई दे रही हैं। उन्हें लग रहा है कि जिस तरह मोदी के नाम पर हरियाणा और महाराष्ट्र तथा दिल्ली में जनता ने जीत की मोहर लगाई है उसी तरह पश्चिम बंगाल से उनकी सत्ता की विदाई ना हो जाए। इस विचार ने उनके आत्मविश्वास को हिला कर रख दिया है। यही कारण है कि वह कांग्रेस के मतदाता सूची में फेरबदल वाले मुद्दे पर साथ चलने को बाध्य हैं। सच्चाई यह है कि आर जी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर के बलात्कार और हत्या के मामले ने बंगाल की जनता को ममता के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। इस एक मामले तथा पिछले 15 सालों में हुए अनेक आर्थिक घोटालों, सरकारी कुप्रबंधन और निर्दोष लोगों की हत्याओं के चलते जनता का ममता बनर्जी से मोह भंग होता जा रहा है। आर जी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद जन आक्रोश के प्रदर्शनों ने ममता के पैरों के नीचे की जमीन हिला कर रख दी है। उनकी आक्रामकता पूरी तरह से सहनशीलता में परिवर्तित हो गई है जो यह दर्शाती है कि ममता पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की हार को सामने खड़ी देख रही हैं। यही कारण है कि वह यह कहते दिखाई दे रही हैं कि चुनाव आयोग ने चुनाव जीतने में भाजपा की मदद की है। वह आरोप लगा रही हैं कि भाजपा के लोगों ने चुनाव आयोग कार्यालय में बैठकर फर्जी वोटर लिस्ट तैयार की है। आयोग उनके राज्य के विभिन्न जिलों में हरियाणा और गुजरात के फर्जी मतदाताओं को जोड़ रहा है। वे जनता को आगाह कर रही हैं कि वह देखती रहे कि उनका नाम तो नहीं काटा जा रहा। सच्चाई तो यह है कि ममता पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी मुसलमानों तथा रोहिंगियाओं के नाम काटे जाने से डर रही हैं क्योंकि इन फर्जी वोटरों का उनकी जीत में बड़ा योगदान होता है। तो वहीं राज्य में बदली हुई परिस्थितियों में राज्य के 70 फीसदी हिंदू मतदाता ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण से तंग आ चुके हैं जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि 2026 में बंगाल में भाजपा के वोट प्रतिशत में निश्चित बढ़ोतरी होगी। ममता भी यह अच्छी तरह समझ रही हैं कि बंगाल का हिंदू मतदाता उनसे नाराज है। यही कारण है कि वे पिछले कुछ समय से हिंदुओं के कार्यक्रमों में सहभागी बनने में लगातार उत्सुकता दिखा रही हैं। यद्यपि बंगाल के चुनाव अभी दूर हैं लेकिन बिहार में यदि एनडीए सरकार की वापसी होती है तो पश्चिम बंगाल दीदी के हाथों से फिसलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता ।

विधानसभा चुनावों में विपक्ष की करारी हार के बाद उसके तेवर ढीले पड़े
विधानसभा चुनावों में विपक्ष की करारी हार के बाद उसके तेवर ढीले पड़े (डॉ हरिकृष्ण बड़ोदिया)