Religion

आचार्य उदारसागर महाराज का वर्षायोग मुरैना में होने की पूर्ण संभावना

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मनोज जैन नायक

जैन संत आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ का पावन वर्षायोग मुरैना में होने की पूर्ण संभावना बलवती दिखाई देती है ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस वर्ष जैन साधु संतों के पावन वर्षायोग की स्थापना 25 जुलाई से 03 अगस्त के मध्य होने जा रहे है। इसी तारतम्य में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ का इस वर्ष का वर्षायोग मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में होने की पूर्ण संभावना दिखाई दे रही है । मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्ष 2024 में युगल मुनिश्री प्रशंसानन्द जी महाराज का एवं 2025 में मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज का वर्षायोग संपन्न हुआ था । मंदिर कमेटी 2026 के वर्षायोग हेतु किसी भी मुनिराज, आर्यिका माताजी की स्वीकृति हेतु निरंतर प्रयासरत थी । काफी प्रयास के बाद कमेटी को अब सफलता मिलती दिखाई दे रही है ।
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पूज्य आचार्यश्री के मुरैना में वर्षायोग स्थापित करने के संदर्भ में संकेत पूर्व में ही प्राप्त हो गए थे । अभी हाल ही में मंदिर कमेटी ने साधर्मी बंधुओं के साथ सोनागिर – डबरा के मध्य आचार्य संघ से मुलाकात कर पुनः मुरैना नगर में चातुर्मास करने का निवेदन किया । हालांकि आचार्यश्री ने अभी मुरैना में वर्षायोग करने की घोषणा नहीं की है और न ही मना किया है । लेकिन मुरैना में उनका वर्षायोग होना सुनिश्चित माना जा रहा है ।

25 या 26 जुलाई को हो सकता है मंगल प्रवेश:
वर्षायोग के संदर्भ में बड़ा जैन मंदिर कमेटी के मंत्री विनोद जैन तार वाले ने जानकारी देते हुए बताया कि परम पूज्य जैनाचार्य उदारसागर जी महाराज अपने शिष्यों के साथ पद विहार करते हुए मुरैना की और बढ़ रहे हैं। झांसी, दतिया, डबरा, ग्वालियर होते हुए मुरैना पहुंचेगे । बुधवार को पूज्यश्री ने डबरा से ग्वालियर मुरैना की ओर बिहार कर दिया है । ग्वालियर पहुंचने के बाद ही मुरैना में नगर प्रवेश एवं वर्षायोग स्थापना की घोषणा हो सकती है । संभावना व्यक्त की जा रही है कि 25 या 26 जुलाई को आचार्यश्री संघ का मंगल प्रवेश मुरैना में हो सकता है । वर्तमान में आचार्य संघ में आचार्यश्री उदारसागरजी, मुनिश्री उपशांत सागरजी, ऐलकश्री उत्साह सागरजी, क्षुल्लक्षश्री उपकार सागरजी (कुल 4 पिच्छिकाएं) मुरैना की ओर पद विहार कर रहे हैं।

जैनाचार्य उदारसागरजी महाराज का परिचय:
आचार्य श्री उदार सागरजी महाराज का गृहस्थ अवस्था का नाम मुकेश जैन था। आपका जन्म 3 दिसंबर 1961 को मध्य प्रदेश के दमोह जिले के बांसा, तारखेड़ा ग्राम में हुआ। आपके पिता का नाम श्री कोमलचंदजी जैन तथा माता का नाम श्रीमती धर्मा बाई जैन है। आपने हायर सेकेंडरी तक शिक्षा प्राप्त की। आपने 02 मार्च 1980 को सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर, दमोह (मध्य प्रदेश) में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के सान्निध्य में ब्रह्मचारी व्रत ग्रहण किया। तत्पश्चात 10 फरवरी 1987 को सिद्धक्षेत्र नैनागिरिजी, छतरपुर (मध्य प्रदेश) में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त की। इसके बाद 28 जुलाई 1988 को मढियाजी, जबलपुर (मध्य प्रदेश) में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज से ऐलक दीक्षा ग्रहण की। आगे चलकर 19 फरवरी 2007 को डूंगरपुर, राजस्थान में आचार्य श्री अभिनंदन सागरजी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त की। आपके तप, त्याग और साधना से परिपूर्ण जीवन को देखते हुए 18 फरवरी 2016 को सांकवाड़ा, डूंगरपुर (राजस्थान) में आचार्य श्री रायन सागरजी महाराज द्वारा आपको आचार्य पद प्रदान किया गया। जिसके पश्चात आप आचार्य श्री उदार सागरजी महाराज के नाम से विख्यात हुए।


वर्षाकाल में चार माह क्यों रुकते हैं जैन साधु संत:
जैन दर्शन में वर्षायोग, जिसे सामान्यतः चातुर्मास भी कहा जाता है । साधु-संतों का वर्षा ऋतु के चार महीनों के लिए एक ही स्थान पर ठहरने का एक प्रमुख अनुष्ठान है। इस दौरान जैन मुनि और साध्वियां अन्यत्र कहीं भी पद विहार नहीं करते । वर्षायोग का मुख्य उद्देश्य अहिंसा धर्म का पालन यानिकी जीवों की रक्षा करना होता है । वर्षा ऋतु में पानी और नमी के कारण जमीन में अनगिनत नए सूक्ष्म जीव कीड़े-मकोड़े और बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं। पैदल चलने या विहार करने से इन जीवों को अनजाने में नुकसान पहुंचने की संभावना सबसे अधिक होती है। पूर्ण अहिंसा के पालन हेतु साधु एक ही स्थान पर स्थिर हो जाते हैं। वर्षाकाल के चार माह आत्म-साधना, आत्म चिंतन और अध्ययन के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं। जैन साधु साध्वी एक ही स्थान पर रहकर गहन ध्यान, स्वाध्याय और तपस्या में अपना समय व्यतीत करते हैं। वे वर्षायोग में स्वयं का कल्याण तो करते ही हैं साथ ही प्राणी मात्र को भी आत्म कल्याण करने के लिए प्रेरित करते हैं। वर्षायोग का मुख्य उद्देश्य आमजन को भी अपने दैनिक जीवन में धर्म, त्याग और सदाचार का पालन करने की शिक्षा देना होता है। गृहस्थजन भी इन चार महीनों में विशेष उपवास, पूजा, स्वाध्याय, अध्ययन, दान-पुण्य, पठन पाठन करते हैं।

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