संसद की गरिमा बनाम राजनीतिक आक्रामकता: क्या लोकतंत्र में महिला सम्मान भी दलगत राजनीति का विषय बन गया है?
डॉ मनीष मेहता
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से चलता है जिन पर जनता भरोसा करती है। इनमें संसद सर्वोच्च है। यही वह मंच है जहाँ सरकार जवाब देती है, विपक्ष सवाल पूछता है और देश के भविष्य की दिशा तय होती है। इसलिए संसद में बोले गए शब्द केवल कार्यवाही का हिस्सा नहीं होते, वे लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान भी बनते हैं।
इसी कारण लोकसभा में महिला सांसदों के साथ कथित दुर्व्यवहार और आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के आरोपों के बाद तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी को मानसून सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित किए जाने की घटना सामान्य संसदीय कार्रवाई नहीं मानी जा सकती। यह प्रकरण संसद की गरिमा, राजनीतिक संवाद और महिला सम्मान—तीनों को एक साथ कटघरे में खड़ा करता है।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भी महिला जनप्रतिनिधि के साथ अपमानजनक व्यवहार या अभद्र भाषा लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। यदि संसदीय प्रक्रिया में ऐसे आरोप प्रमाणित होते हैं तो कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह सिद्धांत भी है कि हर कार्रवाई संसदीय नियमों, उपलब्ध साक्ष्यों और प्राकृतिक न्याय के आधार पर हो। लोकतंत्र भावनाओं से नहीं, प्रक्रिया से चलता है।
संसद की बदलती भाषा चिंता का विषय:
भारतीय संसद का इतिहास बताता है कि मतभेद हमेशा रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच वैचारिक टकराव था। इंदिरा गांधी के दौर में विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए तीखे हमले किए और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी विपक्ष को सम्मान दिया। सुषमा स्वराज, प्रणव मुखर्जी और अरुण जेटली जैसे नेताओं ने कई बार तीखी बहस की, लेकिन शब्दों की मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा।
आज तस्वीर बदलती दिखाई देती है। संसद की बहस कई बार टीवी कैमरों और सोशल मीडिया की सुर्खियों के लिए अधिक और नीति निर्माण के लिए कम होती दिखती है। नारे, व्यवधान, व्यक्तिगत कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप अब सामान्य दृश्य बन गए हैं। इससे संसद की प्रतिष्ठा के साथ-साथ लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।
महिला सम्मान राजनीति का हथियार नहीं होना चाहिए:
भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए दशकों से प्रयास हुए हैं। पंचायतों और नगरीय निकायों में आरक्षण से लेकर संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ऐसे समय यदि महिला सांसदों के सम्मान को लेकर विवाद सामने आते हैं, तो उसका प्रभाव संसद से बाहर समाज तक जाता है।
लेकिन यहाँ एक और प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या महिला सम्मान केवल राजनीतिक सुविधा का विषय बन गया है? जब किसी दल का नेता विवादों में आता है तो उसका दल बचाव में उतर जाता है, जबकि विरोधी दल उसे महिला सम्मान का मुद्दा बना देता है। यदि यही घटना किसी दूसरे दल में होती, तो क्या प्रतिक्रिया वही होती? लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी जब सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए एक समान नैतिक और कानूनी कसौटी लागू होगी
निलंबन समाधान नहीं, सुधार की शुरुआत होना चाहिए:
संसद में निलंबन कोई नई व्यवस्था नहीं है। विभिन्न सरकारों के समय सत्ता और विपक्ष दोनों के सांसद निलंबित होते रहे हैं। लेकिन बार-बार निलंबन की घटनाएँ यह भी बताती हैं कि समस्या केवल किसी एक सांसद की नहीं, बल्कि संसदीय कार्यसंस्कृति की है।
सवाल यह है कि क्या निलंबन के बाद संसदीय व्यवहार में सुधार आता है? यदि नहीं, तो केवल दंड पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों को अपने सांसदों के लिए संसदीय आचरण, भाषा और संवैधानिक मर्यादाओं पर गंभीर प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी। संसद में व्यक्तिगत अपमान के लिए शून्य-सहिष्णुता की नीति लागू करना समय की आवश्यकता है।
लोकतंत्र का स्तर संसद से तय होता है:
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद है। यदि संसद में ही संवाद की जगह टकराव, तर्क की जगह शोर और सम्मान की जगह कटुता आ जाएगी, तो उसका सीधा असर लोकतंत्र पर पड़ेगा। लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान भी है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन वही संविधान गरिमा, समानता और संवैधानिक मर्यादा की भी अपेक्षा करता है। संसद में यह संतुलन सबसे अधिक दिखाई देना चाहिए।
जनता क्या देख रही है?:
देश का मतदाता अब केवल भाषण नहीं सुनता, बल्कि जनप्रतिनिधियों का आचरण भी देखता है। संसद की कार्यवाही आज मोबाइल फोन पर लाइव देखी जाती है। युवा पीढ़ी वहीं से लोकतंत्र का व्यवहार सीखती है। यदि संसद में अभद्रता सामान्य हो जाएगी तो समाज में भी सार्वजनिक संवाद का स्तर गिरना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र की शक्ति ऊँची आवाज़ में नहीं, बल्कि मजबूत तर्कों में होती है। राजनीतिक विरोध जितना प्रखर हो, भाषा उतनी ही मर्यादित होनी चाहिए।
निष्कर्ष:
लोकसभा में सामने आया यह विवाद एक अवसर भी है। अवसर इस बात का कि संसद अपने आचरण पर पुनर्विचार करे। सभी राजनीतिक दल यह स्वीकार करें कि महिला सम्मान किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि संविधान का विषय है। साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि किसी भी सांसद के विरुद्ध कार्रवाई राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि निष्पक्ष संसदीय प्रक्रिया से हो।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने में है। संसद की प्रतिष्ठा तभी सुरक्षित रहेगी जब सत्ता और विपक्ष दोनों यह समझेंगे कि शब्द भी इतिहास लिखते हैं। एक असंसदीय टिप्पणी क्षणिक राजनीतिक लाभ दे सकती है, लेकिन वह लोकतंत्र की साख को दीर्घकालिक क्षति पहुँचा सकती है। इसलिए समय की माँग है—संसद में बहस तीखी हो सकती है, लेकिन भाषा हमेशा मर्यादित होनी चाहिए; राजनीति प्रतिस्पर्धी हो सकती है, लेकिन महिला सम्मान और संसदीय गरिमा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही परिपक्व लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।
