₹8,455 करोड़ का बजट… फिर भी चार दिन की बारिश में क्यों डूब गया इंदौर?
डॉ मनीष मेहता
इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है। यह उपलब्धि सम्मान की पात्र है, लेकिन किसी भी शहर की असली पहचान केवल सफाई रैंकिंग से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि संकट की घड़ी में उसकी बुनियादी व्यवस्थाएँ कितनी सक्षम हैं। पिछले चार दिनों की बारिश ने इंदौर नगर निगम के दावों, योजनाओं और तैयारियों की ऐसी परीक्षा ली, जिसमें व्यवस्था कई स्थानों पर कमजोर साबित होती दिखाई दी।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इंदौर नगर निगम ने ₹8,455.61 करोड़ का बजट प्रस्तुत किया। बजट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि शहर की जल अधोसंरचना, जल आपूर्ति व्यवस्था और संबंधित सुधार कार्य प्रमुख प्राथमिकताओं में रहेंगे। मानसून से पहले जल संरक्षण अभियान चलाया गया, सूखे बोरवेलों को रिचार्ज संरचना में बदलने, जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने और बारिश से पहले आवश्यक तैयारियाँ पूरी करने के दावे किए गए।
लेकिन सवाल यह है कि जब योजनाएँ थीं, बजट था और तैयारियों के दावे भी थे, तो पहली गंभीर बारिश में शहर की तस्वीर इतनी बदहाल क्यों दिखी?
शहर के अनेक प्रमुख मार्गों पर जलभराव हुआ। कई क्षेत्रों में यातायात रुक गया, वाहन पानी में बंद हो गए, लोग घंटों जाम में फँसे रहे और सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। यह दृश्य किसी छोटे कस्बे का नहीं, बल्कि उस शहर का था जिसे देश का मॉडल सिटी बताया जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न बजट के आकार पर नहीं, बल्कि बजट के परिणाम पर है। जनता यह नहीं पूछ रही कि नगर निगम ने कितने करोड़ का बजट बनाया; जनता यह पूछ रही है कि बारिश के समय उसके जीवन में क्या बदलाव आया? यदि हर वर्ष मानसून से पहले तैयारियों का दावा हो और हर वर्ष पहली तेज बारिश में वही जलभराव दिखाई दे, तो समीक्षा केवल मौसम की नहीं, व्यवस्था की होनी चाहिए।
नगर निगम को अब सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए—
- मानसून पूर्व नालों और ड्रेनेज की सफाई पर 2026 में कितना वास्तविक व्यय हुआ?
- किन-किन एजेंसियों और ठेकेदारों को कार्य सौंपे गए?
- कितने किलोमीटर स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज की सफाई हुई?
- कितने जलभराव वाले स्थानों का स्थायी समाधान किया गया?
- कार्यों का थर्ड-पार्टी गुणवत्ता परीक्षण हुआ या नहीं?
- जिन स्थानों पर इस वर्ष भी पानी भरा, वहाँ जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
लोकतंत्र में बजट तालियों के लिए नहीं, जवाबदेही के लिए होता है। हजारों करोड़ रुपये का बजट तभी सार्थक है जब उसका लाभ आम नागरिक तक पहुँचे। अन्यथा बजट के आंकड़े केवल भाषणों और दस्तावेजों की शोभा बढ़ाते हैं।
इंदौर के नागरिक पुरस्कारों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन वे पुरस्कारों से पहले सुरक्षित सड़कें चाहते हैं। वे विज्ञापनों से पहले प्रभावी ड्रेनेज चाहते हैं। वे दावों से पहले परिणाम चाहते हैं।
नगर निगम को अब एक नई परंपरा शुरू करनी चाहिए—मानसून के बाद “सफलता की प्रेस कॉन्फ्रेंस” नहीं, बल्कि “जवाबदेही की सार्वजनिक रिपोर्ट” जारी की जाए। उसमें यह बताया जाए कि कितने दावे पूरे हुए, कितने अधूरे रहे और किन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई।
बारिश प्रकृति का नियम है। लेकिन हर वर्ष शहर का डूब जाना प्रकृति का नहीं, व्यवस्था का दोष है। यदि ₹8,455 करोड़ के बजट वाला शहर भी चार दिन की बारिश के सामने बेबस दिखाई दे, तो आत्ममंथन केवल आवश्यक नहीं, अनिवार्य हो जाता है।
क्योंकि जनता अब यह नहीं पूछ रही कि बारिश कितनी हुई—वह यह पूछ रही है कि व्यवस्था कितनी तैयार थी।

