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सरकारी योजनाएं: उम्मीदें, चुनौतियां और एक नई सोच की जरूरत

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धीरज दुबे, CMA, LLB, MBA | बिज़नेस सलाहकार | जीवन और व्यापार कोच


जब मैंने 11 साल की कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर अपनी कंसल्टेंसी की शुरुआत की, तो सोच यही थी कि अब वो काम करूं जो ज़मीनी बदलाव लाए।सरकार की ओर से ढेरों योजनाएं — जैसे PMEGP, PMFME, स्टैंड-अप इंडिया, राष्ट्रीय गोकुल मिशन, NLM और MSME से जुड़ी कई स्कीमें — बहुत सक्रियता से चलाई जा रही थीं। मुझे लगा कि अब भारत में उद्यमिता की असली लहर शुरू होने वाली है, और मैं इस बदलाव का हिस्सा बनना चाहता था। मैंने अपने स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों, नए उद्यमियों, महिलाओं और युवाओं के साथ काम करना शुरू किया — ताकि सरकार और लोगों के बीच की दूरी को पाट सकूं।
लेकिन जब ग्राउंड पर चीज़ें देखीं, तो एक सच्चाई सामने आई — और वो उतनी खूबसूरत नहीं थी।

  1. सब्सिडी ही लक्ष्य बन गई, व्यापार नहीं
    लोग व्यवसाय करने नहीं, सरकारी पैसा पाने के इरादे से आते हैं।
    “सर, 50% सब्सिडी मिल रही है? बस वही चाहिए।”
    योजना की आत्मा कहीं खो गई है। न व्यवसाय का विज़न है, न उसे चलाने की योजना। फाइलें बन रही हैं, बिज़नेस नहीं।
  2. ट्रेनिंग सर्टिफिकेट अब बस एक कागज़ रह गया है
    EDP यानी उद्यमिता प्रशिक्षण का मकसद होता है कि लोग व्यवसाय की बुनियादी बातें सीखें। लेकिन आज वो बस एक औपचारिकता बन गई है।
    न सीखने की रुचि है, न सर्टिफिकेट का सम्मान।
    जो ट्रेनिंग किसी का सोच बदल सकती थी, वो अब सिर्फ एक और दस्तावेज़ बनकर रह गई है।
  3. वित्तीय और व्यावसायिक जानकारी की भारी कमी
    ज्यादातर लोग इन बातों से पूरी तरह अनजान होते हैं:
    वर्किंग कैपिटल क्या होता है?
    बिज़नेस मॉडल कैसे बनता है?
    मुनाफा कब होगा?
    बाजार कैसे मिलेगा?
    लोन मिल गया तो सब हो जाएगा — यही सोच है। लेकिन बिना ज्ञान के पैसा समस्या बनता है, समाधान नहीं।
  4. मैन्युफैक्चरिंग को कोई छूना नहीं चाहता
    देश में खिलौने, घरेलू सामान, स्टील बॉटल्स, पैकिंग आइटम जैसी हजारों चीज़ें हम खुद बना सकते हैं। लेकिन लोग manufacturing से डरते हैं।
    क्यों? क्योंकि इसमें मेहनत और धैर्य लगता है।
    आज की सोच है — जल्दी पैसा, कम मेहनत। लेकिन बिज़नेस ऐसा नहीं चलता।
  5. सरकार की नीयत साफ है — और यह बात माननी चाहिए
    सरकार अपनी तरफ से कई अच्छी पहल कर रही है:
    50% तक की पूंजी सब्सिडी
    बिना गारंटी लोन
    कम ब्याज दरों पर ऋण
    महिलाओं, किसानों और ग्रामीणों पर फोकस
    स्कीमों का एक-दूसरे से जोड़ना (PMFME + PMEGP + SHG)
    यानी सरकार प्रयास कर रही है। लेकिन असली चुनौती सोच में है।
    अब क्या करना चाहिए? — मेरी अपनी सिफारिशें
    1️ ट्रेनिंग को औपचारिकता नहीं, अनिवार्य मूल्यांकन से जोड़ा जाए
    जो लोग ट्रेनिंग में कुछ नहीं सीखते, उन्हें योजना में आगे नहीं बढ़ाया जाए। EDP में basic test होना चाहिए।
    2️ सब्सिडी को परिणाम से जोड़ा जाए
    अगर कोई व्यक्ति सिर्फ कागज़ दिखाकर पैसा लेकर व्यवसाय नहीं करता, तो सब्सिडी वापस ली जाए। यह जनता का पैसा है — मुफ्त में नहीं जाना चाहिए।
    3️ चयन सोच-समझकर किया जाए
    जिन लोगों के पास थोड़ा अनुभव, विज़न हो — उन्हें प्राथमिकता मिले। सिर्फ “पहले आओ, पहले पाओ” नहीं चलना चाहिए।
    4️ वित्तीय साक्षरता पर काम होना चाहिए
    ब्लॉक स्तर पर, पंचायत स्तर पर — हर जगह बिज़नेस की बेसिक ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। Break-even क्या है, कर्ज कैसे चुकाना है, मुनाफा कैसे निकालना है — यह सब लोगों को समझाना होगा।
    5️ मन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिले
    जो चीज़ें हम आयात करते हैं — वो यहीं बनाई जाएं। इस दिशा में प्रशिक्षित युवाओं को बढ़ावा मिले।

अंत में एक बात…
सरकारी योजनाएं कोई shortcut नहीं हैं,
ये लंबी रेस के घोड़े हैं।
आपको अंबानी, अदानी, पूनावाला बनने के लिए IIM पास होने की ज़रूरत नहीं —
ज़रूरत है सिर्फ साफ नीयत, धैर्य और सच्चे विज़न की।
अगर आपने ठान लिया, तो आप भी अपने गांव या शहर से एक बड़ा उद्यमी बन सकते हैं।
“सिर्फ सब्सिडी लेने के लिए नहीं, एक सफल व्यवसाय बनाने के लिए आगे आइए

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