ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं के लिए नौकरी पाना हो गया है मुश्किल , क्या कहता है PLFS डेटा
भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं के सामने रोजगार का संकट एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey – PLFS) के आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जितनी ऊंची डिग्री, उतनी ही ज्यादा बेरोजगारी की दर कुछ श्रेणियों में दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी रिपोर्ट्स में यह पैटर्न साफ दिखता है।
हालिया चर्चा में 2022-23, 2023-24 और 2025 की रिपोर्ट्स के आंकड़ों को लेकर बात हो रही है। ये आंकड़े बताते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी अपेक्षाकृत ऊंची है। हालांकि सर्वे की पद्धति में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं, इसलिए साल-दर-साल सीधी तुलना में सावधानी बरतनी चाहिए। फिर भी शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच के कमजोर जुड़ाव पर ये आंकड़े सवाल जरूर उठाते हैं।
PLFS आंकड़े: शिक्षा के स्तर के अनुसार बेरोजगारी
PLFS रिपोर्ट्स में शिक्षा के उच्चतम स्तर के आधार पर बेरोजगारी दर (Unemployment Rate) दी गई है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषण में 2025 के आंकड़ों के अनुसार:
निरक्षर: करीब 2.3%
प्राथमिक तक साक्षर: करीब 2.8%
मिडिल: करीब 4.6%
सेकेंडरी: करीब 5.5%
हायर सेकेंडरी: करीब 9.3%
डिप्लोमा/सर्टिफिकेट: करीब 13.8%
ग्रेजुएट: करीब 22.3%
पोस्ट ग्रेजुएट और उससे ऊपर: करीब 24.7%
ये आंकड़े भारत टुडे और अन्य स्रोतों में उद्धृत किए गए हैं, जो MoSPI की PLFS वार्षिक रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। 2022-23 में ग्रेजुएट बेरोजगारी करीब 13.4% और पोस्ट ग्रेजुएट 12.1% थी, जबकि 2023-24 में ये क्रमशः 13.0% और 12.4% के आसपास रहीं। 2025 के आंकड़ों में ऊंची शिक्षा वालों में दरें ज्यादा दिख रही हैं।
कुल मिलाकर 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों में समग्र बेरोजगारी दर 2025 में करीब 3.1% रही (यूजुअल स्टेटस)। शिक्षित (सेकेंडरी और ऊपर) वर्ग में यह 6.5% दर्ज की गई, जो पिछले साल से थोड़ी कम है। युवाओं (15-29 वर्ष) में बेरोजगारी करीब 9.9% रही। सितंबर 2026 के मासिक बुलेटिन में समग्र दर करीब 5% (करंट वीकली स्टेटस) स्थिर रही। ये आंकड़े दिखाते हैं कि कम शिक्षा वाले लोग अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र में काम ढूंढ लेते हैं, जबकि डिग्रीधारी युवा औपचारिक, योग्यता के अनुरूप और अच्छी क्वालिटी की नौकरी की तलाश में रहते हैं। इससे बेरोजगारी दर ऊंची नजर आती है।
रोजगार संबंधी अन्य आंकड़ों और विश्लेषण के लिए देखें – www.journalistdesk.co.in
कारण: क्यों मुश्किल हो रही है नौकरी
उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर के कई कारण हैं। सबसे प्रमुख है कौशल और बाजार की मांग के बीच का मेल न बैठना (Skill-Job Mismatch)। कई डिग्री कोर्स में व्यावहारिक ट्रेनिंग कम होती है। इंडस्ट्री को सॉफ्ट स्किल्स, डिजिटल साक्षरता, समस्या सुलझाने की क्षमता और नए टूल्स की जानकारी वाले उम्मीदवार चाहिए।
दूसरा, रोजगार के अवसरों का स्वरूप। भारत में अभी भी बड़ी संख्या में नौकरियां अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। ग्रेजुएट युवा अक्सर सैलरी वाली स्थायी नौकरी पसंद करते हैं, लेकिन ऐसी नौकरियों की वृद्धि सीमित रही है। स्टार्टअप और नई कंपनियों में अवसर बढ़े हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा भी ज्यादा है।
तीसरा, शिक्षा प्रणाली और उद्योग की जरूरतों का समन्वय। कई कोर्स पुराने सिलेबस पर आधारित हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, ग्रीन जॉब्स और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में मांग बढ़ रही है, लेकिन पारंपरिक कला, कॉमर्स और साइंस ग्रेजुएट्स के लिए अवसर अपेक्षाकृत कम हो सकते हैं।
चौथा, युवा आबादी का आकार। हर साल लाखों ग्रेजुएट नौकरी बाजार में आते हैं। जनसंख्या बढ़ने के साथ श्रम बल भी बढ़ रहा है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अवसरों का अंतर भी भूमिका निभाता है। महिलाओं में बेरोजगारी दर कुछ श्रेणियों में ज्यादा देखने को मिलती है।
अंत में, नौकरी खोजने का तरीका और अपेक्षाएं। कई युवा सरकारी नौकरियों का इंतजार करते हैं या एक खास सैलरी पैकेज की उम्मीद रखते हैं। इससे सक्रिय रूप से नौकरी खोजने वाले लोगों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
सरकारी योजनाएं: रोजगार बढ़ाने के प्रयास
सरकार कई स्तरों पर रोजगार सृजन और कौशल विकास पर काम कर रही है। प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं:
स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): युवाओं को इंडस्ट्री-रिलेवेंट स्किल्स सिखाने के लिए।
नेशनल कैरियर सर्विस (NCS) पोर्टल: नौकरी खोजने वालों और नियोक्ताओं को जोड़ने वाला प्लेटफॉर्म।
स्टार्टअप इंडिया और स्टैंडअप इंडिया: उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) और मुद्रा योजना: छोटे व्यवसाय शुरू करने में मदद।
अटल इनोवेशन मिशन और विभिन्न राज्य स्तरीय कौशल मिशन।
एजुकेशन और स्किलिंग को जोड़ने वाले कार्यक्रम: राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत मल्टीडिसीप्लिनरी एजुकेशन और इंटर्नशिप पर जोर।
इनके अलावा EPFO और अन्य डेटा में फॉर्मल सेक्टर की नौकरियों में वृद्धि के संकेत भी मिलते हैं। सरकार नियमित वेतन वाली नौकरियों का अनुपात बढ़ाने पर ध्यान दे रही है।
युवाओं के लिए व्यावहारिक टिप्स
आंकड़े चिंताजनक हो सकते हैं, लेकिन सही रणनीति से अवसर ढूंढे जा सकते हैं।
स्किल अपग्रेडेशन पर फोकस करें: डिजिटल स्किल्स (एक्सेल, डेटा एनालिसिस, बेसिक प्रोग्रामिंग), कम्युनिकेशन और डोमेन स्पेसिफिक कोर्सेज लें। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और सरकारी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करें।
इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट अनुभव बढ़ाएं: डिग्री के दौरान या बाद में प्रैक्टिकल एक्सपोजर लें। यह रिज्यूमे को मजबूत बनाता है।
नेटवर्किंग और जॉब पोर्टल्स: LinkedIn, NCS पोर्टल, कंपनी करियर पेज और कैंपस प्लेसमेंट का सक्रिय उपयोग करें।
उद्यमिता पर विचार करें: अगर नौकरी नहीं मिल रही तो छोटा व्यवसाय या फ्रीलांसिंग शुरू करने के विकल्प देखें। मुद्रा और स्टार्टअप योजनाओं का लाभ उठाएं।
रिज्यूमे और इंटरव्यू तैयारी: एचीवमेंट्स को नंबर और रिजल्ट के साथ लिखें। मॉक इंटरव्यू का अभ्यास करें।
सेक्टर चुनें: आईटी, हेल्थकेयर, रENEWABLE एनर्जी, लॉजिस्टिक्स, एजुकेशन टेक्नोलॉजी और फाइनेंस में मांग अपेक्षाकृत अच्छी है।
धैर्य और निरंतरता: नौकरी खोजने में समय लग सकता है। नियमित अप्लाई करें और फीडबैक लें।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शिक्षा को सिर्फ डिग्री तक सीमित न रखें। लाइफलॉन्ग लर्निंग और बाजार की जरूरतों के अनुसार खुद को अपडेट रखना जरूरी है।
निष्कर्ष
PLFS डेटा उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार की चुनौती को उजागर करता है। समग्र बेरोजगारी दर नियंत्रित रहने के बावजूद ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट वर्ग में ऊंची दरें चिंता का विषय हैं। कौशल विकास, शिक्षा-उद्योग साझेदारी और उद्यमिता को बढ़ावा देकर इस अंतर को कम किया जा सकता है।
युवाओं को चाहिए कि वे आंकड़ों से निराश होने के बजाय व्यावहारिक कदम उठाएं। सरकार की योजनाओं का लाभ लें और खुद को बाजार के अनुकूल बनाएं। रोजगार का परिदृश्य बदल रहा है और सही तैयारी से अवसर उपलब्ध हैं।
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