विलुप्त होती जा रही त्योहारों पर अपनी भाषा में शुभकामनायें देने की इंदौरी परंपरा
राजकुमार जैन (स्वतंत्र विचारक एवं लेखक)
त्योहार केवल कैलेंडर की तिथियां मात्र नहीं हैं, बल्कि ये वे जीवंत सांस्कृतिक और सामाजिक सेतु हैं जो कला, संगीत, पारंपरिक व्यंजनों और लोकाचार के माध्यम से समाज को एक सूत्र में पिरोते हैं। वर्तमान समय में जब हम चारों ओर देखते हैं, तो उत्सवों का एक व्यापक परिवेश दिखाई देता है। घरों की स्वच्छता, दूर-दराज से परिजनों का आगमन, पकवानों की मधुर सुगंध और वातावरण में व्याप्त आत्मीयता मन को हर्षित कर देती है। हमारे इंदौर में रक्षाबंधन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, और दस दिवसीय गणेशोत्सव के साथ उत्सवों का जो ताना-बाना शुरू होता है, वह शरद ऋतु की शारदीय नवरात्रि, विजयदशमी (दशहरा) और प्रकाश पर्व दीपावली तक अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है। केवल यही नहीं, हमारे यहाँ मालवा की लोक-संस्कृति में रची-बसी रंगपंचमी की गेर, छठ पूजा की लोक-आस्था, मकर संक्रांति का पतंगोत्सव, पोंगल, ओणम, और ईद व क्रिसमस जैसे विविध पर्व भी उसी उत्साह से मनाए जाते हैं, जिनका इंतजार हर इंदौरी परिवार वर्षभर श्रद्धापूर्वक करता है।
विशेषकर इंदौर जैसे उत्सवधर्मी शहर में तो त्योहारों का रंग और भी गाढ़ा हो जाता है। मुझे आज भी याद है जब दिवाली आते ही पूरा शहर एक अनोखे उल्लास में डूब जाता था। राजबाड़ा के ऐतिहासिक कंगूरों के साये में मिट्टी के दीये, धानी, खील और लक्ष्मी-गणेश पूजन के सुंदर पाने (कागज के चित्र) खरीदने की वो रौनक आज भी आंखों में तैर जाती है। पिपली बाजार में ‘रामजी महाराज के मावे’ की शुद्धता और उसकी खुशबू पूरे बाजार में महकती थी, जिससे घर की चक्की और पेड़े बनते थे। किशनपुरा के पुल पर सजने वाली फूलों की मखमली मंडियों से गेंदे के फूलों के हार लाना, फ्रूट मार्केट की गहमागहमी से ताजे फल चुनना, और सावरकर गेट के भीतर से पूजा के लिए बड़े-बड़े गन्ने छांटकर लाना—यह महज खरीदारी नहीं, बल्कि त्योहार को जीने का इंदौरी अंदाज था। रानीपुरा की तंग गलियों से पटाखे खरीदना और फिर साइकिल पर सवार होकर, कैरियर पर मिठाई के डिब्बे लादे घर-घर जाना, अपनों से गले मिलना, बड़े-बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेना—यह आत्मीयता डिजिटल दौर की ‘हैप्पी दिवाली’ में कहीं खो गई है।
अनादि काल से हमारा यह अहिल्या नगर और मालवा अंचल त्योहारों की अनूठी विरासत समेटे हुए है। मुगलों और उर्दू के आगमन से पूर्व, तथा अंग्रेजों और अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व से सदियों पहले से हम इन पर्वों को अपनी मूल भाषा और बोलियों में ही मनाते आ रहे हैं। हमारी परंपरा में ‘शुभकामना’ शब्द का अर्थ अत्यंत गूढ़ है—इसका तात्पर्य है सामने वाले के जीवन में ‘शुभ’ घटित होने की मंगलकामना करना। यही कारण है कि हम पारंपरिक रूप से ‘शुभ दीपावली’, ‘शुभ होली’ अथवा ‘विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं’ कहते आए हैं।
किंतु आधुनिकता और पश्चिमीकरण के तीव्र अतिक्रमण ने हमारे इन विशुद्ध इंदौरी त्योहारों के मूल स्वरूप को प्रभावित किया है। जाने-अनजाने ‘शुभ दीपावली’ कब ‘हैप्पी दिवाली’ (Happy Diwali) में परिवर्तित हो गई, इसका समाज को आभास तक नहीं हुआ। आज सोशल मीडिया और संवाद के डिजिटल माध्यमों पर हिंग्लिश की यह खिचड़ी सर्वव्याप्त हो चुकी है। इस भाषाई संक्रमण के पक्ष में अक्सर यह कुतर्क दिया जाता है कि आधुनिक समाज में संपर्क के लिए अंग्रेजी ही एक सर्वमान्य माध्यम है। किंतु यदि हम सांख्यिकीय धरातल पर आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो यह तर्क हमारे शहर और परिवेश में पूर्णतः खोखला सिद्ध होता है।
हमारे भाषाई और जनसांख्यिकीय प्रामाणिक आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी हिंदी और उसकी समृद्ध बोलियों को अपनी मातृभाषा मानती है। इसके विपरीत, अंग्रेजी को पहली भाषा (मातृभाषा) के रूप में चुनने वाले लोगों की संख्या नगण्य है। केवल औपचारिकता या तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग करने वालों का एक सीमित वर्ग है। स्पष्ट है कि हमारे समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अंग्रेजी के व्यावहारिक और भावनात्मक प्रयोग से सर्वथा दूर है, फिर भी विज्ञापनों और आधुनिकता के छद्म परिवेश ने इसे हमारे त्योहारों पर जबरन थोप दिया है।
हमारी संस्कृति में भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं, अपितु ‘मां’ का दर्जा दिया गया है। स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बीत जाने के उपरांत भी अपनी मातृभाषा के प्रति हम इंदौरी लोगों का यह उदासीन और चलताऊ दृष्टिकोण आत्मचिंतनीय है। हम अपनी ही समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक प्रतीकों के क्षरण पर मूकदर्शक बने हुए हैं। आज के आधुनिक विद्यालय बच्चों को ‘शेक हैंड एंड से हैप्पी दिवाली’ का पाठ पढ़ा रहे हैं, जबकि हमारी मूल शिक्षा यह होनी चाहिए कि बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श कर ‘शुभ दीपावली’ कहें, मित्रों को गले लगाकर परस्पर बधाई दें और समाज में सौहार्द फैलाएं।
चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के अयोध्या आगमन की स्मृति में मनाए जाने वाले इस महापर्व पर ‘Happy दिवाली’ जैसी भाषाई खिचड़ी का उपयोग करने से बेहतर तो ‘Happy Festival of Lights’ कहना होगा, परंतु मातृभाषा की मिठास से सराबोर ‘शुभ दीपावली’ कहना निश्चित ही अद्वितीय है। ‘शुभ’ और ‘हैप्पी’ शब्द के अंतर्निहित भाव में आकाश-पाताल का अंतर है। ‘हैप्पी’ (खुशी) एक नितांत व्यक्तिगत और क्षणिक मानसिक स्थिति है, जबकि ‘शुभ’ एक व्यापक लोक-कल्याणकारी और आध्यात्मिक भाव है। अंग्रेजी में ‘शुभ’ का कोई सटीक समानार्थी खोज पाना अत्यंत कठिन है। जब हम किसी के लिए ‘शुभ’ की कामना करते हैं, तो ‘हैप्पीनेस’ (प्रसन्नता) उसमें स्वतः ही समाहित हो जाती है।
वैश्विक होना सराहनीय है, परंतु अपनी जड़ों को भूल जाना आत्मघाती है। ‘क्या फर्क पड़ता है’ के इस उदासीन भाव ने हमारी संस्कृति को बहुत क्षति पहुंचाई है। अंततः, अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करना, अपने त्योहारों के मूल भाव को समझना और भावी पीढ़ी को एक सुदृढ़ सांस्कृतिक नींव सौंपना हम सब का परम कर्तव्य है। त्योहार आपका है, संस्कृति आपकी है, और आने वाली संतति भी आपकी ही है—निर्णय भी आपका होना चाहिए। अपनी जड़ों की ओर लौटें, इंदौर की उस जीवंत और आत्मीय परंपरा को फिर से जगाएं और गर्व से कहें: शुभ दीपावली!
