जैन संत स्थविराचार्य संभवसागरजी महाराज का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
मनोज जैन नायक
आचार्य श्री आदिसागर जी अंकलीकर स्वामी की परम्परा में 18 भाषाओं के ज्ञाता, अनेक सिद्धियों के धारी, आगम के महा ज्ञानकोष धारी आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी ऋषिराज हुए, जिनके द्वारा जैन दर्शन के अनेक अद्वितीय तपस्वी रत्न तराशे गए। जिनमें वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी ऋषिवर सबसे अनमोल विरले रत्न हुए। ऐसे ही द्वय महागुरू की पावन छत्रछाया को पाने वाले पूज्य स्थविराचार्य श्री संभवसागर जी महामुनिराज है।*
संयम साधना के 60 वसंत देखने वाले, अपनी चर्या में लीन रहने वाले, चिरकाल से साधनारत, वरिष्ठ महातपस्वी आचार्य श्री 108 संभवसागर जी महाराज का जन्म अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी व भारतवर्ष के महान सम्राट रहे महामुनि चन्द्रगुप्त मौर्य की समाधि भूमि वाले, हरे भरे नारियल के वृक्ष वाले जंगलों से सुसज्जित राज्य कर्नाटक के मंगलोर जिले में बैंदर गाँव के सूर्यवंशी क्षत्रीय परिवार में 03 मई, 1941 को हुआ। पिता बालैयाजी माता पार्वती देवी ने नाम रखा था “मंजुनाथ”। धीरे-धीरे लौकिक स्कूल की शिक्षा प्राप्त की। बैंगलोर में सरकारी पद पर कार्य करते हुए योगानुयोग इन कार्यों को छोड़कर तुमकुर के पास मंदारगिरी पहाड़ पर पहुँचे, वहाँ इन्होंने प्रथम बार दिगम्बर जैन प्रतिमाओं के दर्शन किए। एक ब्रह्मचारी जी का सानिध्य मिला, पहली बार जैन अध्यात्म धर्म का श्रवण करने को मिला, जिसे प्राप्त कर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्हीं के सानिध्य में रहकर जैन धर्म की गुढ़ शिक्षा प्राप्त कर वहीं उन्होंने स्वाद रहित भोजन को मंजूनाथ ने अपने जीवन का ध्येय बना लिया और उन्होंने दही, नमक व तेल आदि तीन रसों का जीवन पर्यन्त के लिये त्याग कर दिया। सारे वस्त्र छोड़कर केवल धोती-दुपट्टा को ग्रहण किया। कुछ समय पश्चात ब्रह्मचारी भैयाजी ने जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और नामकरण हुआ अजितकीर्ति महाराज । मुनिराज अजितकीर्ति से मंजुनाथ ने ब्रह्मचर्य व्रत देने का निवेदन किया । मंजुनाथ की देव शास्त्र गुरु के प्रति भक्ति और संयम साधना को देखते हुए उन्हें आजीवन व्रत स्वीकार कराया । नामकरण किया ब्रह्मचारी चन्द्रकीर्ति । ब्रह्मचारी चन्द्रकीर्ति ने उनसे ज्ञानार्जन किया, उनकी आज्ञा से शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी की यात्रा की। यात्रा के दौरान अनेक संतो का समागम प्राप्त हुआ। इसी श्रृंखला में वे महाराष्ट्र के औरंगाबाद पहुँचे, वहाँ पूण्योदय से वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागरजी गुरुदेव के सानिध्य में 8 जून 1964 को सप्तम प्रतिमा व्रत लिया, नामकरण हुआ ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति । आत्म कल्याण एवं संयम साधना के पथ पर तीव्र गति से बढ़ रहे विलक्षण प्रतिभा के धनी ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति को आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ, ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति ने पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में आत्मकल्याणार्थ जैनेश्वरी दीक्षा का भाव रखा। आचार्य श्री ने विभिन्न माध्यमों से उनकी परीक्षा ली, उनसे विविध प्रश्न किए और पार्श्वकीर्ति जी से पूर्ण रूप से सन्तुष्ट होकर व उनके परिवार से स्वीकृति, परिजनों को भी अष्ट मूलगुणों के पालन का नियम देकर दीक्षा हेतु स्वीकृति प्रदान की।
06 जुलाई, 1967 को हुमचा पद्मावती तीर्थ क्षेत्र पर तीर्थ भक्ति शिरोमणि आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी ऋषिराज ने एक साथ तीन भव्यात्मा युवाओं को जैनेश्वरी मुनि दीक्षा प्रदान की। जिसमें पार्श्वकीर्ति जी को मुनि संभवसागर जी, अन्य मुनि कुंथु सागर जी, नमिसागर जी नामकारण किया। पांच वर्षों तक गुरु सानिध्य में निरंतर ज्ञान-ध्यान-संयम तप साधना में लीन रहे। दीक्षा गुरु ने अपनी समाधि से पूर्व मुनि संभवसागर जी को “स्थवीर” पद दिया।
ब्रह्मचर्य व्रत प्रदाता गुरु वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी ने अपने शिष्य मुनि संभवसागर जी की योग्यता देखकर 31 जुलाई, 1980 में मुनि संभवसागर जी को आचार्य पद पर सुशोभित किया। पूज्य स्थविराचार्य श्री संभवसागर जी गुरुदेव पिछले दो दशकों से आजीवन छः रस व अन्न का जीवन पर्यन्त के लिये त्याग कर रखा है।
वर्तमान में पूज्य आचार्यश्री संभव सागर जी महाराज शाश्वत तीर्थराज सम्मेदशिखर जी में अपनी उत्तम समाधि व आत्म साधना के ध्येय के साथ 12 वर्ष की सल्लेखना लेकर त्रियोग आश्रम में साधनारत है। पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री संभवसागर जी महाराज दो प्रतिमा व्रतधारी श्रावको से ही आहार ग्रहण करते है।
शाश्वत तीर्थ श्री सम्मेद शिखर जी में सन 2010/2011 में वाक्केशरी आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज को भी आचार्य श्री संभवसागरजी महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ । आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री संभवसागरजी वात्सल्य से इतने प्रभावित हुए कि वे अपना अधिकांशतः समय पूज्यश्री के श्री चरणों में तत्व चर्चा एवं उनकी वैयावृति में व्यतीत करते थे । आचार्य विनिश्चय सागर ने अपने सम्मेद शिखरजी के सम्पूर्ण वर्षाकाल में पूज्य श्री से तत्व चर्चा, वैयावृति एवं आशीर्वाद लेकर अवसर का पूर्ण लाभ प्राप्त किया ।
संघस्थ बालाचार्य मुनि मोक्षसागर जी, समयसागर जी आपको वैय्यावृत्ति व आर्यिका योग श्रमणी पुनीत चैतन्यमति माताजी आपकी आज्ञा में सदैव तत्पर रहते हैं।
स्थविराचार्य संभवसागरजी ने अपने दीक्षा के अन्तर्गत हजारों उपवास, अनेको व्रत किये, अनेक धार्मिक पुस्तक एवं धवलसार ग्रंथ की रचना की, शिखर जी की 168 वंदना पूर्ण कर सातिशय पूण्य का अर्जन किया। अभी उनकी 12 वर्षों की सल्लेखना चल रही है । वर्तमान में विराजित जैन संतों में पूज्य श्री संभव सागर जी महाराज को सबसे वरिष्ठ मुनिराजों में माना जाता है ।
