देश में कानून लाख बन गए, दल बदलू है कि मानते ही नहीं — क्या अवसरवाद की राजनीति से मजबूत होगा लोकतंत्र?
( डॉ मनीष मेहता)
भारतीय लोकतंत्र में दल बदल कोई नई कहानी नहीं है, लेकिन हर दौर में यह नए चेहरे, नए तर्क और नए राजनीतिक समीकरणों के साथ सामने आता रहा है। आज फिर देश की राजनीति उसी पुराने प्रश्न के सामने खड़ी दिखाई देती है— क्या जनादेश विचारधारा के लिए दिया जाता है या सत्ता के लिए? और यदि जनादेश के बाद नेता ही रास्ता बदल दें, तो मतदाता आखिर किस पर भरोसा करे?
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल है। उद्धव ठाकरे नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में असंतोष और सांसदों की दूरी को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। इसी बीच संजय राउत ने सार्वजनिक रूप से सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका पर नाराज़गी जताते हुए राजनीतिक परिस्थितियों पर सवाल उठाए। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में भी समय-समय पर तृणमूल कांग्रेस के भीतर से नेताओं और सांसदों के दूसरे दलों की ओर जाने की घटनाओं ने यह संदेश दिया कि दल बदल अब किसी एक राज्य या दल की समस्या नहीं रह गया है।
लेकिन यह कहानी केवल आज की नहीं है, भारतीय राजनीति का इतिहास दल बदल के उदाहरणों से भरा पड़ा है। 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में कई बार दल बदलकर “आया राम, गया राम” शब्द को राजनीति का स्थायी मुहावरा बना दिया। इसके बाद कई राज्यों में सरकारें गिरती और बनती रहीं।
जनता पार्टी का दौर, फिर कांग्रेस के भीतर टूट, कर्नाटक में सरकार परिवर्तन, मध्यप्रदेश में राजनीतिक पुनर्संरचना, महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन, गोवा और उत्तर-पूर्व के राज्यों में लगातार दलगत बदलाव— लगभग हर दल कभी न कभी इस राजनीति का लाभार्थी और पीड़ित दोनों रहा है।
विडंबना यह है कि विपक्ष में रहते हुए दल बदल लोकतंत्र की हत्या लगता है, लेकिन सत्ता में रहते हुए वही राजनीतिक विस्तार और जनसमर्थन कहलाने लगता है। यही दोहरा राजनीतिक आचरण लोकतंत्र की नैतिकता को सबसे अधिक चोट पहुंचाता है।
दल बदल विरोधी कानून बनाया गया था ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के विश्वास को व्यक्तिगत या सामूहिक राजनीतिक सौदे में न बदल सकें। लेकिन वर्षों में राजनीति ने कानून की सीमाओं को समझ लिया और नए रास्ते बना लिए। अब बगावत को विचारधारा का नाम दिया जाता है, टूट को संगठनात्मक सुधार कहा जाता है और सत्ता परिवर्तन को जनभावना का सम्मान बताया जाता है।
यह भी सच है कि हर दल परिवर्तन अवसरवाद नहीं होता। कई बार राजनीतिक दलों के भीतर संवाद की कमी, नेतृत्व का केंद्रीकरण, क्षेत्रीय उपेक्षा और वैचारिक मतभेद भी नेताओं को अलग राह चुनने पर मजबूर करते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक नैतिकता तब प्रश्नों में घिरती है जब चुनाव एक विचार पर लड़ा जाए और शासन दूसरे विचार के साथ किया जाए।
यदि किसी सांसद या विधायक को वास्तव में लगता है कि उसकी पार्टी अब जनता की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही, तो लोकतांत्रिक आदर्श यही कहता है कि वह पद छोड़कर फिर जनता के बीच जाए। जनादेश व्यक्ति का नहीं, मतदाता के विश्वास का होता है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न अदालत, आयोग या किसी दल से पहले राजनीति से है— क्या लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बन जाएगा या नैतिकता का भी स्थान बचेगा?
कानून और संस्थाएं लोकतंत्र को संरचना देती हैं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा राजनीतिक आचरण से बनती है।
और जनता पूछ रही है—
नेताओं की बगावत से लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, या केवल सत्ता की कुर्सियां?
